शीर्षक: दिसंबर
पूरे साल की उम्मीदें,
लाद दी जाती हैं जनवरी पर,
सारे हादसों का इल्ज़ाम
अकेला दिसंबर ढोता है..!
ज़ख्म सारा महीना दिया,
इलज़ाम बस दिसंबर को मिला।
दिसंबर तो यूं ही बदनाम है,
लोग कहीं भी, कभी भी बदल जाते हैं।
जिसे बदलना होता है,
वो दिसंबर आने का इन्तजार नहीं करते।
अब दिसंबर में वह बात कहां,
वो सर्द हवाएं,वो शीत लहर कहां।