जिम्मेदारियाँ कंधे पर टाँगे,
आँखों में हजारों सपनों की कतार ।
खा जाती है एक लड़के की
ज़िंदगी की हँसी और खुशनुमा पल।
एक अदद नौकरी की तलाश,
रिश्तेदारों के ताने,
अपने ही परिवार से
अविश्वास और अपमान की पीड़ा।
क्या कुछ नहीं दबा रहता
उसकी हँसी के टूटे हुए
किनारों की परतों में,
चादर ओढ़े छुपी उदासी में।
अपनी विराट आँखों में
मखमली सुकून की तलाश लिए
भटकती है बेज़ार ज़िंदगी ।
और फिर-
आँसुओं का टपकना भी वर्जित है।
सुनो,
उसके चेहरे का दर्द
खूबसूरती बनकर
उसके होठों पर मुस्कुराता है
लेखक:- अभिषेक चारण