Hindi Kavita,Hindi Poem

विषय जो भी हो,
मन व्याकुल है।
क्यों व्याकुल है पता नहीं।

हर घड़ी सोचता है कुछ,
क्यों सोचता है पता नहीं।

घबराता है हर वक्त,
क्यों घबराता है पता नहीं।

नजरे ढूंढती है किसी को,
क्यों  ढूंढती है पता नहीं।

पाना चाहता है किसी को,
क्यों पाना चाहता है पता नहीं।

मन पछताता है किसी बात से,
क्यों  पछताता है पता नहीं।

खोया रहता है किसी की याद में,
क्यों खोया रहता हूं पता नहीं।

मन पागल है किसी के लिए,
क्यों पागल हूं पता नहीं।

अकेला महसूस करता है,
क्यों करता हूं पता नहीं।

इंतजार में रहता है किसी की,
क्यों रहता है पता नहीं।

विषय जो भी हो ,
मन व्याकुल है ,
क्यों व्याकुल है पता नहीं।

मेरे मन की व्याकुलता ❤️✍

लेखक: प्रभु कुशवाहा

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